Wednesday, 9 August 2017

‘सावन’ में शिव साधना के बाद ‘भादो’ में श्रीकृष्ण जन्म: मंगल ही मंगल


संदीप कुमार मिश्र: सावन में शिव की भक्ति और भाव के बाद हिन्दू धर्म के माननो वाले भक्तों को आश्विन माह के पहले भाद्रपद का अतिविशेष माह यानी भादो का महीना उत्साह और उमंगों से भरा हुआ है...इस भादो के महीने का जन जन को इंतजार रहता है...देश ही नहीं विदेशों में भी या यूं कहें कि संपूर्ण धरा धाम पर भाद्र पद का महिना खास है।क्योंकि सावन में शंकर और भादो में कृष्ण यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव...कन्हईया के जन्म का महोत्सव जिसे विश्व भर में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

दरअसल 8 अगस्त से 7 सितम्बर 2017 तक भादों का महीना है।उसके बाद आश्विन मास का प्रारंभ हो जाएगा।भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का माह है भादो। भादों के ही महीने के कृष्ण पक्ष में रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग और वृष लग्न में श्रीहरि भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण रुप में आठवां अवतार लिया। श्रीकृष्ण की उपासना को समर्पित भादों का महीना कल्याण करने वाला है।

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं।
देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुं।।

हमारे देश के साथ सनातन धर्म को माननो वाले विश्व में जहां कहीं भी रहते हैं, जन्माष्टमी का पर्व बड़ी ही श्रद्धा भाव और धूमधाम के साथ मनाते हैं।जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और रात 12 बजे तक विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आयोजन,भजन किर्तन का आनंद उठाते हैं,और रात्रि 12 बजे कृष्ण जन्म के बाद गोविंद की पूजा-अर्चना करते हैं फिर प्रसाद वितरण करके भक्त व्रत खोलते हैं। वहीं मंदिरों की छटा तो देखते ही बनती है।इस खास अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में विशेष आयोजन किए जाते हैं।

नीति,प्रीति, समर्पण और भावना प्रधान  हैं श्रीकृष्ण
कृष्ण जन्मभूमि के अलावा द्वारकाधीश, बिहारीजी एवं अन्य सभी मन्दिरों में इसका भव्य आयोजन होता है, जिनमें भारी भीड़ होती है। कृष्णावतार,श्रीहरि भगवान विष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है।गोकुल में यह त्योहार 'गोकुलाष्टमी' के नाम से मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल्यकाल की शरारतें जैसे - माखन व दही चुराना, चरवाहों व ग्वालिनियों से उनकी नोंकझोंक, तरह-तरह के खेल, इन्द्र के विरोधकर गोवर्धन पर्वत को अपनी अँगुली पर उठा लेना, जिससे कि गोकुलवासी अति वर्षा से बच सकें, विषैले कालिया नाग से युद्ध व उसके हज़ार फनों पर नृत्य, के साथ ही कन्हैया की मनभावन,लुभा लेने वाली बांसुरी का कर्णप्रिय स्वर, कंस द्वारा भेजे गए गुप्तचरों का विनाश...ये सभी प्रसंग नीति,प्रेम समर्पण और भावना प्रधान वाले हैं।


भगवान श्रीकृष्ण युगों-युगों से हमारी आस्था का केंद्र है, और निरंतर हमें हमारे कर्तव्य का बोध करवाने के साथ ही प्रेम और एकता का संदेश देते हैं।कन्हैया कभी यशोदा मैया के लाल होते हैं तो कभी ब्रज के नटखट कान्हा और कभी गोपियों का चैन चुराते छलिया।वहीं कभी विदुर की पत्नी का आतिथ्य स्वीकार करते हुए सामने आते हैं, तो कभी अर्जुन को 'गीता' का ज्ञान देते हुए। लीलाधारी कृष्ण कन्हैया के अनेक रूप और हर रुप संपूर्ण।