Saturday, 13 August 2016

आज़ादी के मायने:एक और स्वतंत्रता की दरकार

संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों आज क्या है आजादी के मायने।जिस भारत मां को कठिन संघर्ष,त्याग और बलिदान से हमारे वीर सपुतों ने गुलामी की बेड़ियों से आजादी दिलवाई थी,और 15 अगस्त 1947 को गुलामी की चादर ओढ़ी..हमारी भारत मां ने स्वतंत्रता की अंगड़ाई ली थी। भारत मां को आजाद करवाने के लिए इस देश के वीर सपूतों ने हंसते हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए।क्या हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजली दे पा रहे हैं।जिस भारत की परिकल्पना उन्होने की थी,क्या आज वैसा भारत नजर आता है?
हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी जरूरतों में रोशनी सबसे बड़ी जरूरत है। रोशनी की जरूरत समझने के लिए चाहे हम अंधकार को भी आवश्यक बताते रहें, लेकिन जिंदगी...अंधेरे की सुरंग के पार देखना चाहती है, जहां देखने और उत्सव मनाने के लिए बहुत कुछ है। रोशनी में सब कुछ नजर आता है, वे आपदाएं और तकलीफें भी...जिनके पार जाना है, जिनके कारण रास्ते रुके और हम अनुभव करते हैं कि परिवर्तनआवश्यक है।
अंधेरे के पार जाना जिंदगी का स्वभाव है, वह स्वार्थ नहीं है।इस स्वभाव के कारण अपने सघन अंधेरों के बीच मनुष्यों ने दुनिया की रोशनी, खुशहाली, समृद्धि के लिए प्रार्थना की और रास्ते तलाश किए।

दरअसल भारतीय इतिहास में सबसे बड़ी दुर्घटना तो उन विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण थे, जिनका लक्ष्य देश को लूटना और मनोबल गिराना था, दुर्भाग्य से वे कामयाब भी हुए।पराधीनता के इस काल में सब तरह के अंधेरे सघन होते गये।उपनिवेशवादियों ने अपार धन अपने-अपने देशों में भेजा।गांवों के उद्योग चौपट हो गये, कृषि के उत्पाद सात समंदर पार जाने लगे।अथाह दरिद्रता, दु:ख-दीनता, निरक्षरता, और अपराध ने मनुष्य होने की सारी गरिमा खंडित कर दी।
इस बात में कोई शक की गुंजाइश नहीं कि भारत का महाअंधकार गरीबी है। जिसने दूसरे कई अंधेरों, अनिश्चयों, अपराधों और अवसादों के घेरे बनाये हैं। गरीबी ने कई-कई तरह के अंध-विश्वास, अहंकार, अज्ञान के चादर फैलाये हैं।गरीबी ने ही यह समझने नहीं दिया है कि हमारी गैर-बराबरी, विषमताएं, कुपोषण, कुशिक्षा और अनेक तरह के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अन्याय ईश्वरीयनहीं हैं, और न वे अटल हैं। वे उस व्यवस्था का परिणाम हैं जिसने देश को अघाये हुए लोगों और भूखे, गरीबों के बीच बांट दिया है।
सवाल उठता है-
क्या भारतीय-समाज ने कट्टरता के कई-कई अंधेरों से मुक्त होने का संघर्ष नहीं किया है ? दरिद्रता, स्त्री, जाति, संस्थानिक धर्म और पंथवाद के विरुद्ध आक्रामक संघर्ष नहीं लड़े हैं ? क्या प्रकृति, सृष्टि, ईश्वर, जन्म-मरण के विषय में भारतीय मनीषा में गहन विचार-विमर्श नहीं हुआ है?
किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र की मुक्ति-यात्र द्वंद्वरहित नहीं होती।अच्छे, सभ्य, समतावादी समाज को कई अवरोधों से लड़ना पड़ता है।अकल्पित यातनाएं भी आती हैं लेकिन अंधकार की हार होती है। रोशनी के सहस्रों दिये जलते हैं।जिसकी शुरुआत निश्चिततौर पर हो चुकी है।हो चुकी एक ऐसी शुरुआत जिससे तम हटेगा...उजियारा होगा...आजाद भारत में एक और आजादी मिलेगी...भूख से,गरीबी से ,बेरोजगारी से,भ्रस्टाचार से,जातिवाद से,वंशवाद से,उंचनीच से,और हर उस राक्षस से जिससे भारत के विकास की गति धीमी हो जाती है।

          आईए हम सब मिलकर बनाएं एक एक स्वस्थ भारत,स्वच्छ भारत..
                          जय हिन्द,जय भारत।।