Wednesday, 24 August 2016

जन्माष्टमी व्रत पूजा-विधान

संदीप कुमार मिश्र: नंद के लाल कृष्ण कन्हैया का जन्मोत्सव...जन्माष्टमी...जिसे देश ही नहीं विदेशों में भी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है...योगीराज कृष्ण का गाती संदेश किसी संजीवनी से कम नहीं...जिसका अनुसरण संसार कर रहा है...जब-जब सृष्टी पर अत्याचार अनाचार बढ़ा है...असुर प्रवृति के कारण धर्म का ह्रास हुआ...तब तब स्वयं प्रभु दीनानाथ भगवान श्रीविष्णु इस धराधाम पर धर्म की स्थापना और असुरों का नाश करने के लिए अवतार लिए...कभी राम रुप में कभी कृष्ण रुप में...सोलह कलाओं से पूर्ण भगवान का बड़ा ही मनभावन रुप है कृष्णावतार...भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया।और धर्म की स्थापना की।
इस दिन को संपूर्ण संसार कृष्ण जन्माष्टमी या जन्माष्टमी के रूप में बड़े ही भक्तिभाव और उमंग और उत्साह के साथ मनाता है।जन्माष्टमी के दिन समस्त नर-नारी यहां तक की बच्चे भी व्रत रह कर श्रीकृष्ण भजन किर्तन में मध्य रात्री का इंतजार करते हैं...इस विशेष अवसर पर मंदिरों में सुंदर-सुंदर झाँकियाँ बनाई व सजाई जाती है और सांवरे सलोने कन्हईया को झूला झुलाया जाता है।
आईए जानते हैं कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर सबसे सरल और सुलभ तरीके से पूजा कैसे करें-

भगवान श्रीकृष्ण का 5243वाँ जन्मोत्सव
निशिता पूजा का समय = 24:43+ से 25:26+
समय = ० घण्टे ४२ मिनट्स
मध्यरात्रि का क्षण = 25:04+
26th को, पारण का समय = 06:22 (सूर्योदय के बाद)
पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो गये हैं
दही हाण्डी - 26, अगस्त
अष्टमी तिथि प्रारम्भ = 24/08/2016 को 12:47 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त = 25/08/2016को 10:37 बजे
व्रत-पूजन विधान
जन्माष्टमी का व्रत धारण करने वाले को व्रत के पूर्व रात्रि को सुपाच्य हल्का भोजन ग्रहण करना चाहिए साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए।व्रत के दिन सबसे पहले प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से व्रती को निवृत्त हो जाना चाहिए ततपश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को सादर प्रणाम कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाना चाहिए।क्रमश: बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प लेना चाहिए-
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥


अब दोपहर के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें और फिर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक बात का विशेष ध्यान रखें कि संभव हो तो बाल गोपाल कृष्ण की मूर्ति में स्तनपान कराती हुई माता देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों,ऐसे तो भाववत्सल भगवान है भाव के भूखें हैं हमारे कृष्ण कन्हैया।
ऐसा करने के बाद विधि-विधान से श्रीकृष्ण पूजन पर ध्यान लगाएं।
पूजन में व्रतदारण करने वाले के साथ ही पूरा परिवार मैया देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, माता यशोदा और माता लक्ष्मी का नाम क्रमशः स्मरण करना चाहिए।
अब निम्न मंत्र के माध्यम से मूर्ति के सामने पुष्पांजलि अर्पण करना चाहिए-
'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।'
इस प्रकार सरलता और सुलभता से यथा सामर्थ्य कन्हैया को भोग लगाकर प्रसाद का वितरण करना चाहिए और जगराता करते हुए भजन-कीर्तन करना चाहिए और अंत में श्रीकृष्णजन्मोत्सव का आनंदसहित आरती गानी चाहिए और जयकारा लगाना चाहिए..जय कन्हईया लाल की...वृंदावन बिहारी लाल की जय...आज के आनंद की जय...धर्म की जय...अधर्म का नाश हो...प्राणियों में सदभावना हो...विश्व का कल्याण हो...।
      भगवान श्रीकृष्ण आप सभी की मनोकामनाओं को पूरा करें...जय श्रीकृष्ण।।