Saturday, 27 February 2016

महिषासुर पर भी संसद में महाभारत जरुरी है क्या...?

संदीप कुमार मिश्र:  कहते हैं विवाद बढ़ाने के लिए किसी विषय की जरुरत नहीं होती,कुछ भी बोल दिजिए,कैसे भी बोल दिजिए...क्योंकि विषयांतर होकर बोलने के लिए किसी सार्थक मुद्दे की जरुरत नहीं होती।ध्यान भटकाने के लिए किसी की भी भावना को आघात पहुंचाया जा सकता है ,ठेस पहुंचाया जा सकता है।ऐसे भी कहते हैं कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी है! संविधान में अधिकार मिला हुआ है कुछ भी बोलने का...जिसका परिणाम है किसी गांव दिहात...जंगल कंदराओं को तो छोड़ ही दिजिए...देश की राजधानी दिल्ली में ही देश विरोधी नारे लगाए जाते हैं...और अफजल गुरु जैसे देशद्रोहीयों का समर्थन किया जाता है...क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी जो है !अब साब नारों की सियासत और तथाकथित बुद्धिजिवीयों को कौन कहे कि राम...कृष्ण और परमहंस की धरती पर आद्य शक्ति जगत जननी मां जगदम्बा पर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया जाएगा तो हंगामा तो होगा ही...।
दरअसल संसद में जिस प्रकार से मानव संसाधन विकास मंत्री ने तथाकथित बुद्धीजिवियों के विश्वविद्यालय जेएनयू में अतित में हुए महिषासुर और माता दुर्गा की चर्चा को उछाला,वो निश्चित तौर पर ठीक नहीं था...लेकिन...लेकिन...संदर्भ...प्रसंग और व्याख्या के नजरिये से देंखें तो जिस प्रकार से कांग्रेस और लेफ्ट की पंगु मानसिकता से संसद और देश का समय बर्बाद हो रहा है,कारण चाहे जेएनयू में लगे देशविरोधी नारे हों या फिर रोहित बेमूला का मुद्दा हो...उसमें व्याख्या करना आवश्यक तो था...लेकिन कहने के और तरीकों को तलाशा जा सकता था...शायद यही वजह है संसद में हुई इस बहस से असम और बंगाल में होने वाले चुनाव की बु आ रही है...!
अब साब हमारे मीडिया को तो टीआरपी चाहिए...सो संसद की इस बहस ने उन्हें मुद्दा दे दिया... अपनी बहस से हमारे एंकर और पत्रकार बंधूओं ने महिषासुर का गुणगान और मां दुर्गा पर खुब चर्चा की...उदाहरण भी ना जाने कहां कहां से लेकर आए।खुब गुत्थमगुत्थी हुई...लेकिन असल सवाल या मुद्दा क्या है..? इस पर ना तो किसी ने चर्चा की ना ही सवाल पूछा गया...।
सवाल ये उठता है कि मां दुर्गा पर ऐसी चर्चा क्यों ? वहीं महिषासुर को राक्षस कहकर संबोधित क्यों किया जाता है ? जहां तक मैने समझने का प्रयास किया है कि हमारे धर्म ग्रंथ,सनातन संस्कृति... अच्छाईयों के उत्थान और बुराईयों के पतन की बातें बताती है....समाज को जोड़ने का ही कार्य करती हैं...मानवता की संवाहक है हमारी सनातन संस्कृति...कहने को तो रावण प्रकांड पंडित था,जिसने बुराई का साथ दिया और उसका पतन हुआ और धर्म की स्थापना हुई...ठीक उसी प्रकार जन कल्याण के लिए माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया।कहने का मतलब है कि समाज में सर्व धर्म समभाव की भावना को बनाए रखने का संदेश ही हमारे शास्त्र और पुराण देते हैं...जिनकी तुलना इतिहास से नहीं की जा सकती..और वर्तमान के तथाकथित बुद्धीजिवियों के कुतर्कों से तो कतई नहीं की जा सकती...।
जेएनयू पर हो रहे महासंग्राम में संसद से लेकर सड़क तक उबाल है।जो उबाल अब लगता है कि सरकार बनाम अन्य की लड़ाई बन गई है।लेकिन मूल सवाल यही है कि क्या संसद में अब यही होगा ? इसी प्रकार से हमारे सियासतदां क्या अनर्गल की बहस करके समय और संसद को बरबाद करते रहेंगे...क्या सत्ता का मोह अब इस कदर हमारे जन प्रतिनिधियों पर हावी हो गया है कि सत्ता पाने की जल्दबाजी में हम देश के बुनियादी मुद्दे जैसे-गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी, भ्रस्टाचार को भुलते जा रहे हैं,देश के विकास की बात कम हो रही है,तमाम जरुरी बिल ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं...और संसद में हंगामा है कि थमने का नाम नहीं ले रहा है।क्या ऐसे ही चलेगा देश ? ऐसे ही होगा राष्ट्र निर्माण ?
अंतत: जरुरत है आस्था को सियासत से परे रखा जाए और देशहित और विकास के पहिए को आगे बढ़ाया जाए...विकास एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा समाज में फैली कुरीतियों,बुराईयों को दूर किया जा सकता है।और इसी विकास की रुपरेखा हमारी संसद के माध्यम से हमारे सियासतदां बनाते और बढ़ाते हैं...अब आलोचना करने के लिए आलोचना बंद की जानी चाहिए, सकारात्मक परिणाम निकले इस लिए चर्चा की जाए।संसद में हो-हंगामा करके समय और जनता की गाढ़ी कमाई को बर्बाद ना किया जाए...सार्थक चर्चा और परिचर्चा की जाए...। 
   

Friday, 26 February 2016

स्मृति इरानी का करारा जवाब...अद्भुत, अकल्पनीय, अविश्वसनीय !

संदीप कुमार मिश्र:  पढ़ लिखकर अगर इंसान देशद्रोही बनता है,तो नही चाहिए एसी शिक्षा,पढ़ लिखकर अगर इंसान मर्यादा भूल जाए तो किस काम की ऐसी शिक्षा।पढ़ लिखकर ओछी हरकत ही की जाए तो शिक्षा उसी प्रकार है जिस प्रकार रावण का ज्ञान था।और रावण का क्या हुआ हम सब जानते है,युगों-युगों से जलता आ रहा है रावण और अनंत काल तक,जब तक सृष्टी रहेगी तब तक जलता रहेगा रावण...।
खैर,आप समझ ही गए होंगे कि कहने का भाव और आशय क्या था।अब साब जेएनयू में पढ़कर मानसिकता देशविरोधी ही हो तो काहें का अच्छा संस्थान जी,प्रकांड पंडित की डिग्री मिल जाए और आचरण मुर्खता जैसा हो तो क्या फायदा एसी शिक्षा और संस्था का।
बहरहाल मैं किसी खास की बात नहीं करता है,लेकिन हमारे देश की सियासत से हम और आप अछूते नहीं रह सकते,और ना ही मेरे कंप्यूटर के कीबोर्ड रुपी कलम...अब संसद में छिड़े महासंग्राम की ही बात कर लें।सत्ता से बेदखल बौखलाई कांग्रेस हो या फिर आम वाम जैसे तमाम दल...जिनकी जमीन ही नही खिसकी...ना जाने कहां गायब हो भी गई,जिसका मिलना भविष्य के गर्त में है। जरा याद कीजिए उन खास पलों को जब आपने सुषमा स्वराज जी को लोकसभा में बोलते हुए सुना था।जिनकी सादगी और शब्दों के साथ ही सटीकता का कायल हर कोई हुआ करता था।एक शानदार व्यक्तित्व,वक्ता,बहुमुखी प्रतिभा की धनी सुषमा जी को सुनना हर किसी को अच्छा लगता है...।
कुछ वैसी ही झलक लोकसभा में पिछले दिनों देखने को मिली...जो अविश्वसनीय...अकल्पनिय था समूचे विपक्ष के लिए। क्योंकि स्मृति की सटीक दहाड़ और चित्कार के आगे विपक्ष भाग खड़ा नजर आया।विपक्ष की समझ में ही नहीं आ रहा था कि जवाब क्या दें और पूछें क्या।हर कोई बगलें झांकता नजर आया।जिसने हिम्मत भी जुटाई,उसे करारा जवाब देकर स्मृति इरानी ने बुरे सपने जैसा ऐहसास करा दिया।
स्मृति इरानी...जिनकी योग्यता का पैमाना विपक्ष के लिए मात्र 12वीं पास का था...लेकिन पुरुष प्रधान समाज में बड़े बड़े ज्ञानवीर,घपले घोटाले वाले सियासतदां स्मृति इरानी के आगे चित्त हो गए...कुछ ऐसे नजर आने लगे जैसे हंसो के बीच बगुला...ये हाल सिर्फ लोकसभा का ही नहीं रहा, राज्यसभा में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला...जब दलितों की इकलौती मसीहा खुद को मानने वाली मायावती जी को भी समझ में नहीं आर हा था कि इस रणचंडी का सामना कैसे करें...क्योंकि उनकी जीत और ज्ञान का आधार तो मात्र दलित ही हैं,उन्हें नहीं मतलब की दलितों के उत्थान के लिए क्या करना है,कैसे करना है...वास्तव में क्या होना चाहिए....क्या सिर्फ आरक्षण से दलितों का उत्थान हो सकता है..? बहन जी को तो नहीं सरोकार इन सभी बातों से। उन्हें तो बस दलित..बस दलित...।खैर,मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने उन्हें भी सही और सटीक जवाब दिया...और वो भी अन्य के साथ सन्न रह गई और हो हंगामे में शामिल हो गई,क्योंकि सार्थक बहस से बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि हंगामा करना शुरु किया जाए या फिर बीच बहस से निकल लिया जाए।
सवाल उठता है कि आखिर योग्यता का पैमान क्या यही है कि स्मृति इरानी की बात सिर्फ इसलिए ना सुनी जाए क्योंकि उनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां नहीं है...? स्मृति एक कलाकार रही हैं, क्या इसलिए उनकी बात की अनदेखी करना उचित है...?या फिर वो नारी है इसलिए..?बेहद अफसोस लेकिन एक बात कहूंगा दोस्तों डिग्रियों से चलता देश हमने देख लिया है,जिसमें ना जाने कितने घोटाले...कितने भ्रस्टाचार हुए थे...अब एक ऐसी सरकार को भी देखना जरुरी है...जिसका सरोकार आम आदमी और देशहित से हो..!
दरअसल स्वतंत्र भारत में हम सदियों से महिलाओं को अबला ही कहते आ रहे हैं,और यही आदत भी बन गयी है...कुछ इसी तरह ही भारत की आजादी के कई दशकों बाद भी हम लोकतंत्र के मंदिर संसद में महिलाओं की इमानदार हिस्सेदारी अब तक तय नहीं कर पाए हैं।सवाल उठता है कि एक सफल टीवी अभिनेत्री के रूप में तो हम स्मृति इरानी को पसंद करते हैं, लेकिन जैसे ही वो सियासत में दांव आजमाने के लिए अमेठी पहुंचती हैं तो परिवारवाद के यूवराज को भी बेचैनी और घबराहट होने लगती है,ब्लड प्रेशर से लेकर ना जाने क्या-क्या उपर नीचे होने लगता है।जिसके लिए स्मृति इरानी को याद दिलाया जाने लगता है कि आप सिर्फ 12वीं पास हो..?अफसोस...!!!!!
अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि हमारे सियासी सियारों की घृणित पुरुषवादी मानसिकता ही है कि भौंहे तन गई,माथा लाल हो गया कि आखिर कैसे संसद में एक महिला ने समूचे विपक्ष को धराशायी और स्तब्ध कर दिया। सौ फीसदी संसद में स्मृति इरानी की सशक्त-अकाट्य और सधे हुए तर्कों ने नारी का सम्मान और भी बढ़ा दिया,और सियासत के जंग लगे नेताओं को सोचने पर मजबुर कर दिया कि अच्छे दिन के संकेत ऐसे भी होते हैं जनाब...। खैर...वैचारिक विकलांग टाइप "अंकलों" की बातों पर ध्यान देने की जरुरत नहीं है।क्योंकि देश की यूवा पीढ़ी स्त्री शक्ति का ऐसा ही रुप देखने की इच्छुक भी है,और चाहिए भी।
 

Wednesday, 24 February 2016

महाशिवरात्रि महात्म्य व पूजा विधान

संदीप कुमार मिश्र: सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है।तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदर कहा जाता है।दोस्तों भगवान शिव की महिमा अपरंपार है,जो जल्द ही प्रसन्न होने वाले हैं।भोलेनाथ को प्रसन्न करने का ही महापर्व है...शिवरात्रि...जिसे त्रयोदशी तिथि, फाल्गुण मास, कृ्ष्ण पक्ष की तिथि को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।महाशिवरात्रि के महान पर्व की विशेषता है कि सनातन धर्म के सभी प्रेमी इस त्योहार को मनाते हैं।
महाशिवरात्रि के दिन भक्त जप,तप और व्रत रखते हैं और इस दिन भगवान के शिवलिंग रुप के दर्शन करते हैं।इस पवित्र दिन पर देश के हर हिस्सों में शिवालयों में बेलपत्र, धतूरा, दूध,दही, शर्करा आदि से शिव जी का अभिषेक किया जाता है।देश भर में महाशिवरात्रि को एक महोत्सव के रुप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन देवों के देव महादेव का विवाह हुआ था।महाशिवरात्रि का महात्योहार हर्ष और उल्लास का महापर्व है।
महाशिवरात्रि व्रत महात्म्य
हमारे धर्म शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले साधक को मोक्ष की प्राप्ती होती है।जगत में रहते हुए मुष्य का कल्याण करने वाला व्रत है महाशिवरात्रि। आज के दिन व्रत रखने से साधक के सभी दुखों,पीड़ाओं का अंत तो होता ही है साथ ही मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है।कहने का मतलब है कि शिव की सादना से धन-धान्य, सुख-सौभाग्य,और समृ्द्धि की कमी कभी नहीं होती। भक्ति और भाव से स्वत: के लिए तो करना ही चाहिए सात ही जगत के कल्याण के लिए भगवान आशुतोष की आराधना करनी चाहिए।मनसा...वाचा...कर्मणा हमें शिव की आराधना करनी चाहिए।भगवान भोलेनाथ..नीलकण्ठ हैं, विश्वनाथ है।
हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रदोषकाल यानि सूर्यास्त होने के बाद रात्रि होने के मध्य की अवधि,मतलब सूर्यास्त होने के बाद के 2 घंटे 24 मिनट कि अवधि प्रदोष काल कहलाती है।इसी समय भगवान आशुतोष प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है।इसी समय सर्वजनप्रिय भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यही वजह है, कि प्रदोषकाल में शिव पूजा या शिवरात्रि में अवघड़दानी भगवान शिव का जागरण करना विशेष कल्याणकारी कहा गया है। हमारे सनातन धर्म में 12 ज्योतिर्लिंग का वर्णन है।कहा जाता है कि प्रदोष काल में महाशिवरात्रि तिथि में ही सभी ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था।
महाशिवरात्रि व्रत: विधि व पूजा विधान
महाशिवरात्रि का व्रत हमसब के लिए है।भोलेभंडारी तो सबसे लिए निराले हैं...जिनकी महिमा का गुणगान जितना भी किया जाए उतना ही कम है।भोले तो अपने साधकों से पान फूल से भी प्रसन्न हो जाते हैं।बस भाव होना चाहिए। इस व्रत को जनसाधारण स्त्री-पुरुष , बच्चा, युवा और वृ्द्ध सभी करते है। धनवान,हो या निर्धन,श्रद्धालू अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिन रुद्राभिषेक और यज्ञ करते हैं,पूजन करते हैं।और भाव से भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने का सहर संभव प्रयास करते हैं।
महाशिवरात्रि का ये महाव्रत हमें प्रदोषनिशिथ काल में ही करना चाहिए। जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करने में असमर्थ हो, उन्हें रात्रि के प्रारम्भ में तथा अर्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन अवश्य करना चाहिए।
व्रत करने वाले पुरुष को शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान व नित्यकर्म से निवृत्त होकर ललाट पर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर शिवालय में जाना चाहिए और शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं भगवान शिव को प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिये-

शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥
महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान व `ओम हीं ईशानाय नम: का जाप करना चाहिए। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम: का जाप व तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम: तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।


महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण
दोस्तों  महाशिवरात्रि पूजा विधान के समय ओम नम: शिवायएवं शिवाय नम:मंत्र का जाप अवश्य करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर समर्पयामिकहकर पूजा संपन्न करनी चाहिए। पश्चात कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर महाशिवरात्रि पूजन कर्म शिवार्पण करने का विधान हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है।
अंतत: महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहि‌ए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है,साथ ही भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।भगवान भोलेनाथ,महादेव,आशुतोष आप सभी की समस्त मनोकामनाओं को पूरा करें।।
                                  ऊं नम: शिवाय ।।

Wednesday, 17 February 2016

जेएनयू का असली मास्टर माइंड उमर खालिद गिरफ्त से कब तक रहेगा दूर..?

संदीप कुमार मिश्र: देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित शिक्षा के केंद्र जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों ने धिरे-धिरे राष्ट्रव्यापी रुप ले लिया।एक तरफ इन नारों की सियासत में कुछ देशप्रेमी निकलकर सामने आए तो कुछ पर देशद्रोह का मुकद्दमा दर्ज हुआ।लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या वास्तव में असल देशद्रोही अपने सही ठिकाने पर पहुंच पाया...?दरअसल ये सवाल इसलिए भी कि क्योंकि कन्हईया कुमार जिसपर देशद्रोह का मुकद्दमा दर्ज है,उसके साथ जो शख्स था असल में देशविरोधी नारे वही लगा रहा था।वो शख्स कोई और नहीं उमर खालिद था।जिससे सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर जेएनयू प्रशासन से इजाजत लेकर अफजल गुरु की शहादत दिवस मना रहा था,और देशविरोधी नारे लगा रहा था। 

नारे भी ऐसे कि किसी भी भारतीय का खून उबलने लगे साब...पाकिस्तान जिंदाबाद” “गो इंडिया गो बैक” “भारत की बरबादी तक जंग रहेगी जारी” “कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जारी” “अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं” “तुम कितने अफजल मरोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा” “अफ़ज़ल तेरे खून से इन्कलाब आयेगा....सुना आपने,किस तरह से देश के सबसे बड़े शिक्षा के मंदिर में देश के सब्सिडि के रुपये-पैसे का शानदार दुरुपयोग किया जा रहा था।
दरअसल छात्रसंघ के नेता कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद देशभर में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे है,हड़ताल भी जारी है,लेकिन तमाम उधेड़बुन और जांच पड़ताल के बाद दिल्ली पुलिस की एक रिपोर्ट से यही लग रहा है कि देश के साथ गद्दारी और देशविरोधी नारों का मास्टरमाइंड कोई और नहीं उमर खालिद है जो कि एक छात्र नेता है और कन्हैया के साथ हर जगह साथ नजर आ रहा था।फिलहाल उमर खालिद का कोई अतापता नहीं है कि वो कहां है।लेकिन पुलिस उसकी तलाश कई राज्यों मों कर रही है।
उमर खालिद...डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन का नेता है।सवाल उठता है कि आखिर क्या है, उमर का जेएनयू कनेक्शन ?आपको जानकर हैरानी होगी कि जेएनयू में 9 फरवरी को हुए देशविरोधी नारों में उमर खालिद की ही अहम भूमिका थी। इसी शख्स ने राजधानी दिल्ली के सबसे बड़े प्रतिष्ठित शिक्षा के मंदिर में उस दिन भी अफजल गुरु की बरसी पर कार्यक्रम का आयोजन करवाया था जिसमें बड़ी संख्या में कश्मीरी छात्र भी शरीक हुए थे और देश विरोधी नारे लगाए गए थे,जिसकी तस्दीक उस दिन के विडियोज़ भी करते हैं।।


ताज्जुब तो तब होता है जब इस पूरे कार्यक्रम की इजाजत नहीं दी गई तब भी डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन ने वामपंथी संगठनों को साथ लेकर से काम किया,जिसकी अगुवाई कोई और नहीं उमर खालिद ही कर रहा था।इतना ही नहीं नारों की गंदी सियासत करते हुए उमर खालिद ने जेएनयू प्रशासन के साथ ही ABVP के खिलाफ तो नारेबाजी की ही और हद तो तब कर दी जब पूरे होशोहवाश में देश विरोधी नारे भी लगाने शुरु कर दिए। ABVP के विरोध में जब वामपंथी संगठनों का एक के बाद एक प्रदर्शन जेएनयू कैंपस में हो रहा था उस समय भी उमर खालिद, कन्हैया के साथ ही खड़ा नजर आया।
यहां बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रांगण में उमर खालिद या फिर डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के लोग ने पहली बार ऐसी हरकत की थी,तो जवाब होगा शायद नहीं...क्योंकि इससे पहले भी जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक इस शक्स ने पहले भी कई बार ऐसी हरकतें की थी,यहां तक कि दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसने डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन की हरकतों को लेकर दो बार जेएनयू प्रशासन को भी आगाह किया था। पुलिस का ये भी कहना था कि उमर खालिद के साथियों ने ही जेएनयू कैंपस में देवी देवताओं की आपत्तिजनक तस्वीरें लगाकर नफरत पैदा करने की हर संभव कोशिश की थी। उमर खालिद के ग्रुप ने ही जब आतंकी अफजल गुरु की फांसी दी गई थी तो जेएनयू कैंपस में मातम भी मनाया था।
हद तो तब हो गई जब साल 2010 में हमारे सीआरपीएफ के जवानो की जब  छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा हत्या की गई तो पर खालिद एण्ड कंपनी ने उसका भी जश्न मनाया। उमर खालिद एण्ड कंपनी की जेएनयू कैंपस बढ़ती हरकतों को लेकर दिल्ली की पुलिस ने साल 2015 के अक्टूबर महिने में ही गृह मंत्रालय को भी एक रिपोर्ट दी थी।वावजूद इसके न तो उमर खालिद और न ही उसके संगठन डेमक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन पर कोई कार्यवाही की गई।जिसका परिणाम है कि आज शिक्षा का सबसे शानदार गढ़ बदनाम हो रहा है।
अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि उमर खालिद जैसे भटके लोगों ने जेएनयू की छवी और साख को मिट्टी में मिला दिया है,अफसोस तब और भी होता है जब वाम का इकबाल बुलंद करने वाले लोग भी ऐसे लोगों के सात मिलकर देसविरोधी नारे लगाते हैं और देश की साख को चोट पहुंचाते हैं।और तो और देश के सियासतदां देशहित पर भी सियासत करने से बाज नहीं आते...।जो सर्वथा गलत है।

Sunday, 14 February 2016

केजरीवाल सरकार:अनेक बवाल बनाम एक साल:क्या है रिपोर्ट कार्ड

संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों सियासत में कुछ भी स्थायी और अस्थायी नहीं होता।राजनीति में कब किसका उदय हो जाए और कब किसका राजनीतिक पतन हो जाए कोई नहीं जानता।देश की आवाम नें सियासत में पार्टीयों का उदय और अंत दोनो देखा।ऐसे ही सियासी सफर की शुरुआत होती है देश की राजनीति में एक नई पार्टी की...आम आदमी पार्टी...जिसका उदय इतने अल्प समय में होता है कि देश के सियासी इतिहास में नाम दर्ज कर गया।
दरअसल राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान ने आपके मुखिया,कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक में उपज भी देखी,तो यहीं पर उसने आम आदमी पार्टी के गठन का इरादा भी सुना।इतना ही नहीं यही मैदान दिल्ली की सल्तनत में सबसे ताकतवर सरकार के शपथ ग्रहण का प्रत्यक्ष साक्षी भी बना।अब से ठीक एक साल पहले यहीं से आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने अपनी पीर्ण बहुमत वाली दूसरी शानदार सियासी पारी की शुरूआत की थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार का स्वाद चखने के बाद 10 फरवरी को आए दिल्ली विधानसभा के नतीजों के साथ अरविंद केजरीवाल सियासत के नए नायक बनकर उभरे। दिल्ली की 70  में से 67 सीटें जीतकर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और देश की सियासत में ऐसा फेरबदल  किया की अच्छे-अच्छे राजनीतिक पंडित भी दांतो तले उंगली दवा लिए ।

अब जैसा की केजरीवाल सरकार का क साल पूरा हो गया तो लाजमी है कि समिक्षा भी होगी,और होनी भी चाहिए। आपको बता दें कि सरकार गठन के बाद अपने पहले दस दिन में केजरीवाल सरकार ने बिजली सस्ती और पानी मुफ्त कर दिया। लेकिन पार्टी में अंदरखाने जरुर कुछ ऐसा चल रहा था जो ठीक नहीं था,और पार्टी की अंदरूनी कलह सामने आई।जिसके तहत पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ये विवाद करीब डेढ़ महीने तक चला,अंतत: योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण बाहर हो गए।
सरकार बनने के बाद केजरीवाल सरकार लगातार विवादों में बनी रही।सुर्खियों में बने रहने के लिए तमाम तरह के हथकंड़े भी अपनाए जाने लगे।जिसका एक दुखद पहलु 22 अप्रैल को देखने को मिला। जब पार्टी ने दिल्ली के जंतर मंतर पर मौजुदा केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने के लिए रैली बुलाई। लेकिन इस रैली में राजस्थान से आये किसान गजेन्द्र ने सबके सामने पेड़ से लटककर खुद को फांसी लगा ली।ये दुखदायी घटना सियासत में टकराव लेकर आई।गजेंद्र की खुदकुशी को केजरीवाल सरकार ने शहादत में बदलने की भरपूर कोशिश की और मुआवज़े के अलावा उसके नाम पर किसान सहायता योजना तक शुरू कर दी गई।लेकिन केंद्र की मोदी सरकार और दिल्ली की केजरीवाल सरकार खुलकर आमने सामने आ गई।
विवादों भरा सफर केजरीवाल सरकार का जारी रहा।इसी क्रम में नया विवाद तब और बढ़ गया जब मई के महीने में केजरीवाल सरकार एक कार्यवाहक मुख्य सचिव को नियुक्त करने के मुद्दे पर नजीब जंग से भिड़ गई।क्योंकि सरकार ने जिस अफसर की नियुक्ति चाहती थी, एलजी महोदय ने उसकी बजाय IAS शकुंतला गमलिन को मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया।जिसके बाद दिल्ली की सियासत में एक नई बहस चल पड़ी कि दिल्ली में कोई नियुक्त प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि की बात मानने को बाध्य है या नहीं। मामला बढ़ता देख केंद्र सरकार ने एक नॉटिफिकेशन जारी किया और कहा कि दिल्ली में एलजी महोदय ही सब कुछ हैं।उनका आदेश सर्वोपरि है।
कभी खुशी कभी गम के साथ सरकार आगे बढ़ती रही लेकिन केजरी सरकार को उस वक्त एक और बड़ा झटका लगा जब दिल्ली पुलिस ने केजरी सरकार के कानून मंत्री रहे जीतेन्द्र तोमर को फर्ज़ी डिग्री के मामले में गिरफ्तार कर लिया।जनाब केजरीवाल अपने मंत्री के साथ खड़े तो रहे, लेकिन तमाम सबूत तोमर के खिलाफ गए और केजरीवाल ने उनसे इस्तीफा ले लिया।इतना ही नही केजरीवाल सरकार और दिल्ली पुलिस के बीच मतभेद भी खुलकर सामने आने लगे।लेकिन केजरी सरकार के तमाम नेता किसी ना किसी फर्जीवाड़े में जेल की हवा खाते रहे।
शनै:शनै: केंद्र और दिल्ली सरकार का विवाद आगे बढ़ रहा था तभी एक बड़े विवाद ने दिल्ली की सियासत में भूचाल खड़ा कर दिया और केजरीवाल अपना आपा खोकर मोदी सरकार को खरी खोटी सुनाते हुए शब्दों की मर्यादा तार तार कर दी।दरअसल 15 दिसंबर को सीबीआई ने दिल्ली सचिवालय में छापा मारा।सीबीआई ने कहा कि केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही है। वहीं आम आदमी पार्टी ने सीधे-सीधे आरोप लगाया कि राजेंद्र कुमार बहाना हैं, केजरीवाल निशाना हैं।आप पार्टी ने आरोप लगाया कि इस छापे के ज़रिए मोदी सरकार अरुण जेटली को डीडीसीए मामले में बचाना चाहती है।

तभी केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में प्रदूषण कम करने की एक मुहिम के तहत राजधानी में ऑड-ईवन का फॉर्मूला लागू किया जो जिसका लाभ निश्चिततौर पर दिल्ली की जनता को मिला भले ही वो प्रदुषण के स्तर पर ना हो लेकिन ट्रैफिक की समस्य से जनता को जरुर कुछ हद तक निजात मिली।परिणामस्वरुप आने वाले अप्रैल महीने में आड-इवन एक बार फिर लागू किया जाएगा। इतना ही नहीं केजरी सरकार ने नर्सरी के दाखिले में भी दखल दिया, बीआरटी कॉरिडोर खत्म किया, छात्रों के लिए कर्ज का इंतज़ाम किया और ऐसे कई फ़ैसले किए जो शायद कमजोर तबकों को लाभ पहुंचाए।लेकिन केजरीवाल का सफर पिछले एक साल में लगातार उलझता रहा ,वजह चाहे उनकी राजनीतिक समझ की हो या फिर संवैधानिक सीमाओं की वजह से।लेकिन विवाद और केजरी सरकार का चोली दामन का साथ रहा।


इसी क्रम में MCD कर्मचारियों की 13 दिन चली हड़ताल ने और भी बड़ा हंगामा खड़ा किया । इस विवाद मे केजरीवाल के जमकर पुतले जले।दरअसल दिल्ली सरकार लगातार दलील देती रही कि उसने MCD कर्मचारियों की सैलरी दे दी और निगमों के अध्यक्ष उस पर झूठ बोलने की तोहमत मढ़ते रहे।
खैर केजरी सरकार जब अपने एक साल पूरे करने का जश्न मना रही है तो विपक्ष तमाम सवाल भी उठा रहा है।सरकार ने जब अपने विधायकों की सैलरी 400% बढ़ाने का बिल पास कराया तो सबने पूछा कि भ्रष्टाचार ख़त्म करने और सादगी से रहने की बात करने वाली पार्टी को इतना पैसा क्यों चाहिए ? सबसे बड़ा सवाल विज्ञापनों के नाम पर रखे 526 करोड़ की रकम पर उठा। इस मामले में केजरीवाल की दलील भी लोगों के गले नहीं उतरी।लेकिन हां सुर्खीयों में कैसे रहा जाता है ये जरुर सरकार जान चुकी थी...और उसी रास्ते पर आगे बढ़ रही थी...जिसकी उम्मीद भविष्य में भी की जा रही है।
अंतत: जब अन्ना हजारे के आंदोलन से निकलकर केजरीवाल ने 'राजनीति की सफाई' के लिए झाड़ू उठाई तो दिल्ली की आवाम उने साथ हो ली थी। लेकिन दिल्ली में AAP की ऐतिहासिक जीत के साथ बाजी पलटी और दोस्तों का कारवां बढ़ता गया।अब तो केजरीवाल के दोस्तों की लिस्ट लंबी हो चली है।कहना गलत नहीं होगा कि कभी जो लालू प्रसाद फूटी कौड़ी केजरीवाल को नहीं सुहाते थे अब उनके साथ मंच भी साझा करते हैं और गलबहींयां भी करते हैं।इतना ही नही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार का नाम भी उनके खसमखास की लिस्ट में सबसे उपर है।खासकर केंद्र से दो दो हाथ करने के मामले में।

कहने को तो बदलाव की राजनीति और भ्रष्टाचार दूर करने के लिए आम आदमी पार्टी का उदय सियासत में हुआ।लेकिन जल्द ही केजरीवाल की सियासत भी उसी रास्ते पर चल पड़ी,जिसे देस की जनता देक कर उब चुकी थी।कहना गलत नहीं होगा कि टीम केजरीवाल को काम करने के नए और बिना किसी टकराहट वाले रास्ते तलाशने होंगे।ससे उनका राजनीति का सफर भी लंबा हो सके और जनता को राहत भी मिल सके।



पाक के F-16 को करारा जवाब देगा भारत का सुखोई-30MKI

संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों अमेरिका ने पाकिस्तान को F-16 फाइटर प्लेन देने के फैसला किया तो भारत ने इसपर अपनी नाराजगी जाहीर की।क्योंकि पाकिस्तान ऐसा मुल्क है जिसकी ना कोई नेक नियती है और ना ही कोई इमान।ऐसे में बात अमेरिका की करें तो विश्व का सबसे ताकतवर मुल्क वही करता है जिसमें सिर्फ उसका हित नजर आता है।ऐसे में बात चाहे आतंकवाद की हो या फिर पाकिस्तान की।इसी लिहाज से अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत बनाने के लिए पाकिस्तान को अपना F-16 फाइटर प्लेन देने का फैसले किया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब पाक को अमेरिकी फाइटर प्लेन देने को राजी हो गया है तो ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या F-16 फाइटर प्लेन भारत के लिए वाकई किसी चुनौती से कम नहीं है।क्या भारत के पास इससे बेहतर फाइटर प्लेन है ? क्या भारत पाकिस्तान के F-16 से निपटने में सक्षम है ?क्या हम पाक को करारा जवाब दे सकते हैं..?
F-16 से बढ़ेगी पाकिस्तान की ताकत ?
दोस्तों 80 के दशक से ही F-16  अमेरिका के मुख्य फाइटर प्लेन में से एक रहा है। समय और जरुरत के लिहाज से इसकी तकनीक को और भी उन्नत किया गया। और F-16 अब भी अमेरिकी वायुसेना का अहम हिस्सा है। F-16  को ताकतवर अमेरिकी सेना का प्रतीक माना जाता है।आपको बतै दें कि अमेरिका इससे पहले भी पाकिस्तान को F-16 फाइटर प्लेन दे चुका है,लेकिन ये F-16 पुराने फाइटर प्लेन से ज्यादा उन्नत तकनीक से लैस है।पाकिस्तान को F-16 मिलने से निश्चित तौर पर उसकी हवाई ताकत में इजाफा होगा।जो भारत के लिए चिंता का विषय है।
भारत के पास क्या है F-16 जवाब..?
अब यहां ये सोचना स्वाभाविक ही है F-16 के जवाब में भारत के पास क्या है।क्या हम F-16  के आगे लाचार हो जाएगें..? तो करारा जवाब भी सुन लिजिए-नहीं..कभी नहीं।दरअसल हमारी सेना के पास F-16  का जवाब पहले से ही मौजुद है और वह है मित्र देश रूस के सहयोग से हमारे देश भारत में ही निर्मित सुखोई-30MKI...।यकिनन सुखोई-30MKI को दुनिया के सबसे ताकतवर फाइटर प्लेनों में से एक माना जाता है। सुखोई-30MKI कई मामलों में अमेरिकी फाइटर प्लेन F-16 से बहुत आगे है।मतलब हमारे देश के पास F-16  का करारा धुल चटा देनेवाला जवाब पहले से ही मौजूद है।
भारत का सुखोई या पाकिस्तान का F-16, कौन है दमदार ?
ये जानना भी जरुरी है कि सुखोई-30MKI को बनाने के लिए भारत और रूस के बीच 2000 में समझौता हुआ था जबकि F-16 का निर्माण अमेरिका द्वारा सबसे पहले 1974 में किया गया था।वहीं भारत को पहला सुखोई-30 फाइटर प्लेन साल 2002 में मिला था।2015 में रूस के सहयोग से भारत ने स्वेदश में ही निर्मित सुखोई MKI30 को भारतीय वायुसेना में शामिल करके अपनी ताकत कई गुना बढ़ा ली। लंबाई से लेकर रेंज और मिसाइल ले जाने की क्षमता तक के मामले में सुखोई MKI30 पाकिस्तान के F-16 से कहीं बेहतर है। वर्तमान की बात करें तो भारत के पास 200 से ज्यादा सुखोई-30MKI फाइटर प्लेन हैं।
भारत का सुखोई है दमदार और शानदार
दरअसल स्वदेशी प्रणाली से बना सुखोई लंबी रेंज और उच्चा क्षमता वाला फाइटर प्लेन है। सुखोई-30MKI कुछ ऐसी तकनीकों से लैस है जोकि दुनिया में किसी और फाइटर प्लेन में नहीं है।तकनीक की बात करें तो इसमें सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम लगा है,जिसकी वजह से सुखोई-30MKI किसी भी मौसम में, दिन और रात कभी भी काम करने के लिए तैयार है।वहीं इसमें लॉन्ग रेंज रेडियो नेविगेशन सिस्टम भी लगा है।इसके अलावा इसमें ऑटोमेटिक फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम लगा है। ऑटोमेटिक सिस्टम से नेविगेशन सिस्टम को जानकारी मिलते ही यह खुद ही फ्लाइट के रूट से जुड़ी गुत्थियों को खुद ही सुलझा लेता है, जिसमें अपने टारगेट को नेस्तनाबूद करने के अलावा वापस एयरफील्ड तक लैंडिंग करना शामिल है। वही F-16 सुखोई से बहुत पहले विकसित होने की वजह से कई आधुनिक तकनीको से परे है।


अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि भारत के पास पाकिस्तान की हर चाल का जवाब मौजुद है। चाहे वो F-16 ही क्यों ना हो।हमारा सुखोई-30 MKI है ना...।