Sunday, 29 November 2015

बेटे की चाह ही क्यों..! आखिर कब बदलेगी भारतीय सोच.?



संदीप कुमार मिश्र: जमाना बदल रहा है,मिजाज भी बदल रहा है,तरक्की की राह पर अग्रसर दे के लोगों का जीवन स्तर भी बेहतर हो गया है। हमारा देश भारत लगातार आर्थिक तरक्की कर रहा है, लेकिन बेहद अफसोस की आज भी लोगों की सोच वही है जहां सिर्फ बेटे की चाहत रखी जाती है!क्या लड़कियां किसी मामले में कम हैं लड़को के..? या फिर उका समर्पण परिवार के प्रति कम होता है...?क्या सिर्फ कहने के लिए हम आधुनिक हो रहे हैं लेकिन ख्यालात पुराने ढर्रे पर ही है आज भी...? 

दरअसल किसी जमाने में हमारे देश में ये कहा जाता था कि साक्षरता के अभाव में लोग बेटियों को गर्भ में मारते थे और बेटे की चाहत रखते थे।लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं।दरअसल भारत की साक्षरता में पिछले एक दशक के दौरान 11 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई, लेकिन लड़कियों के प्रति इस देश का नजरिया वहीं का वहीं रह गया है।मतलब साफ है कि 21 वीं सदी के भारत में भी लोगों में बेटों की चाहत बरकरार है। बेटियों को जन्म देना आज भी हमारे समाज में मजबूरी समझा जाता है।

ज्यादा अफसोस तो तब होता है कि हम जानते है कि एक पढ़ी लिखी,साक्षर बेटी दो परिवारों को शिक्षित बनाती है, मां पत्नी और बहन के रुप में,हर कदम पर लड़कियां जिंदगी के हर मोड़ पर, हर जंग में पुरुषों का साथ हर कदम पर निभाती है।तभी तो सदियों से,युगों-युगों से सनातन संस्कृति के संवाहक देश भारत में नारी को नारायणी माना जाता है ,देवी माना जाता है।उसकी पूजा की जाती है। उन्हें गृहलक्ष्मी माना जाता है। लेकिन क्या हकीकत में स्त्री को यह सम्मान मिल रहा है हमारे समाज में ?यकिनन जवाब है, नहीं। आज भी हमारे सोच की धूरी में लड़का ही है,क्योंकि 21 वीं सदी में रहने पर भी हमें यही लगता है कि बुढ़ापे का सहारा बनने और अपने वंश को आगे ले जाने के लिए तो बेटा ही चाहिए।
  

हमारे समाज में बेटियों के प्रति बड़ा ही उदासीन रवईया अपनाया जाता है,और बेटों को ही तवज्जो दी जाती है। हमारे देश में साक्षरता का स्तर और संपन्नता का ग्राफ बढ़ रहा है,लेकिन सोच अब भी वही है। हाल ही में आए परिवार के आकार और लिंगानुपात के आंकड़ों की माने तो बेटा पाने की चाहत में आज भी लोग गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच करवाने और बार-बार गर्भधारण जैसे तरीके अपना रहे हैं। इसके मुताबिक बड़े परिवारों में लिंगानुपात में कम अंतर नजर आया. इससे पता चलता है कि जिन परिवारों में बेटे कम थे या नहीं थे वहां बार-बार प्रेग्नेंसी को चुना गया।या यूं कहें कि तब तक बार-बार गर्भधारण किया जाता है, जब तक कि बेटा पैदा न हो जाए। यही वजह है कि ऐसे परिवारों की संख्या 9 लाख थी,जिनमें सभी 6 लड़कियां थीं जबकि सभी 6 बेटों वाले परिवारों की संख्या महज 3 लाख ही थी।

थोड़ी और गहराई मे जाएं तो पता चलता है कि जिन महिलाओं के एक ही बच्चे थे,उनमें से 2.2 करोड़ महिलाएं ही बेटियों की मां थीं, जबकि ऐसी 2.85 करोड़ महिलाओं के पास बेटे थे।इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लड़कियों की तुलना में कहीं ज्यादा संख्या में लड़के पैदा हुए। इतना ही नहीं जिन महिलाओं के दो बच्चे थे,उनमें से 2.6 करोड़ महिलाओं के दो बेटों थे,जबकि इससे लगभग आधी संख्या यानी कि 1.33 करोड़ महिलाएं ही ऐसी थी, जिनकी दो बेटियां थीं। कुछ ऐसी ही स्थिति उन परिवारों की भी है,जिनके तीन बच्चे हैं। ऐसे परिवारों में भी सभी तीन लड़के या दो लड़के और एक लड़कियों की संख्या उन परिवारों से ज्यादा थी, जहां तीनों लड़कियां थीं या दो लड़कियां और एक लड़का था।

वहीं लिंग जांच न करवाने वाले बड़े परिवारों में तो और भी चौंकाने वाली बात सामने आती है। इन परिवारों में बेटों की चाह में बार-बार गर्भधारण करने का चलन दिखता है।यही कारण है कि  जिन परिवारों में 6 बच्चे थे,उनमें छह लड़कों की बजाय छह लड़कियों के होने की संभावना ज्यादा थी।आंकड़ों की माने तो परिवार के बड़े होने पर लड़कियों के बचने की संभावनाएं घटती जाती हैं।जिन परिवारों में एक ही बच्चा है उनमें लड़कियों के लड़के मुकाबले बचने की संभावनाएं ज्यादा होती है, क्योंकि लड़कियों की प्राकृतिक शिशु मृत्युदर लड़कों से कम होती है।दो बच्चों वाले परिवारों में लड़कियों के बचने की संभावनाएं काफी घट जाती है, लेकिन 6 बच्चों के परिवारों में तो लड़कियों के बचने की संभावनाएं सबसे कम होती हैं।


शायद यही वजह है कि तमाम प्रयासों के बावजूद अब भी देश में महिला और पुरुष लिंगानुपात में जबर्दस्त अंतर है। खासकर 0-6 वर्ष की उम्र के बच्चों का लिंगानुपात वर्ष 2001 के प्रति एक हजार लड़कों पर 923 लड़कियों के मुकाबले घटकर वर्ष 2011 में प्रति एक हजार लड़कों पर 919 रह गया।जिससे पता चलता है कि भारतीयों की पढ़ी-लिखी आबादी भी बच्चियां पैदा करने से न सिर्फ हिचकता है,बल्कि उन्हें गर्भ में मारा भी जा रहा है।यूनीसेफ के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर रोज लड़कों की तुलना में 7 हजार लड़कियां कम पैदा होता हैं, जबकि ब्रिटिश मेडिकल जनरल लैंसेट के मुताबिक देश में हर साल 5 लाख लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है।

अंतत: हम भारतियों को ये जानना और मानना होगा कि लड़कियां किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं है,जरुरत है तो उन्हें प्रोत्साहित कर आगे लाने की,शायद ही आज देश का कोई ऐसा क्षेत्र हो,जिसमें इस देश की बेडियां अग्रणी भूमिका ना निभा रही हों...।देश को विकास की रफ्तार देनी है तो बेटियों को उनका हक देना होगा,धरती पर आने देना होगा,शिक्षित बनाना होगा।यकिन मानिए भाईयों बेटियां ईश्वर का दिया हुआ ऐसा उपहार हैं जिनके बीना सृष्टी की कल्पना ही नहीं की जा सकती।