Tuesday, 20 October 2015

नवरात्र का नवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा




संदीप कुमार मिश्र: जगतजननी मां जगदम्बा का नवां स्वरुप मां सिद्धिदात्री का है। मां भगवती का नौवें स्वरूप सिद्धिदात्री देवी के नाम से जाना जाता है।भगवान शंकर द्वारा प्राप्त सभी सिद्धियां इनमें निहित है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लहिमा, प्राप्ति, प्राकाम्या, इषक, वषित्र आठ मूख्य सिद्धियां हैं।देवी पुराण के अनुसार भगवान शंकर का अर्द्धनारिश्वर स्वरूप देवी सिद्धिदात्रि का ही है।
देवी सिद्धिदात्री का स्वरुप का दिव्य मांगलिक व अत्यन्त मनोहारी है।इनकी चार भुजाएं हैं,जिनमें क्रमश: चक्र,शंख, गदा और कमल पुष्प सुशोभित हैं।अचूक संग्राम के उपरान्त देवी ने दुर्गम नामक दैत्य का वध किया था।इसी कारण ये मां दुर्गा के नाम से भी विख्यात हैं।मंत्र-तंत्र यंत्र की अधिष्ठात्री देवी सिद्धिदात्री की उपासना से साधक को समस्त सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।माता अपने भक्तों के संपूर्ण मनोरथ को पूर्ण करती हैं।मां भगवती के परम पद को पाने के उपरान्त अन्य किसी भी वस्तु को पाने की लालसा नहीं रह जाती है।

मां दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं।नवरात्र-पूजन के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है।नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। दुर्गा मईया जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुईं और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का।मां सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती हैं।मां की सवारी सिंह हैं।देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है।देवताग,ऋषि-मुनि, असुर,नाग,मनुष्यगण सभी मां के भक्त हैं।देवी जी की भक्ति जो भी हृदय से करता है।मां उसी पर अपना स्नेह लूटाती हैं।

नौवें दिन हवन पूजन विधान
सिद्धिदात्री देवी उन सभी महाविद्याओं की अष्ट सिद्धियां भी प्रदान करती हैं, जो सच्चे हृदय से उनके लिए आराधना करता है। नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा-उपासना करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करके जो भक्त नवरात्र का समापन करते हैं। उनको इस संसार में धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा कर रहे हैं,उन्हें नवमी के दिन निर्वाण चक्र का भेदन करना चाहिए।दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है।हवन से पूर्व सभी देवी देवाताओं एवं माता की पूजा कर लेनी चाहिए।हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी आहुति देनी चाहिए,बाद में माता के नाम से आहुति देनी चाहिए।
दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं।इसलिए सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है।देवी के बीज मंत्र ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” कहकर  कम से कम 108 बार हवन मंडप में आहुती देनी चाहिए।

मां सिद्धिदात्री के मंत्र :
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

हवन में जो भी प्रसाद चढ़ाया जाए उसे बाटना चाहिए और हवन की अग्नि ठंडी होने के बाद उसे पवित्र जल में विसर्जित कर देना चाहिए या फिर भक्तों में बांट देना चाहिए।यह भस्म,रोग, संताप एवं ग्रह बाधा से हमारी रक्षा करती है और मन से हर प्रकार के भय को दूर रखती है।
नवदुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है।यह देवी भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी के समान कमल के आसन पर विराजमान हैं और इनके हाथों में कमल , शंख , गदा और सुदर्शन चक्र हैं। देव,यक्ष,किन्नर,दानव ऋषि-मुनि,साधक,विप्र और संसारीजन सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्र के नौवें दिन करके जीवन में यश,बल और धन की प्राप्ति करते हैं।
सिद्धिदात्री देवी मां सरस्वती का भी स्वरूप हैं जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती हैं। नौवें दिन सभी नवदुर्गाओं के सांसारिक स्वरूप की गंगा, नर्मदा कावेरी या समुद्र जल में विसर्जित करने की परंपरा भी है। नवदुर्गा के स्वरूप में साक्षात पार्वती और भगवती विघ्नविनाशक गणपति को भी सम्मानित किया जाता है। देवी मां के लिए बनाए नैवेद्य की थाली में भोग का सामान रखकर मां से प्रार्थना करनी चाहिए-

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि ।
                      सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥ 

भोग समर्पण के पश्चात दुर्गा चालीसा,विन्ध्येश्वरी चालीसा,विन्ध्येश्वरी स्तोत्र का पाठ करके श्री दुर्गाजी की आरती करनी चाहिए और फिर नवरात्रों को हाथ जोड़कर विदा करना चाहिए।इस प्रकार से व्रत रखने वाले नर-नारी पूजा समाप्त करके भोजन ग्रहण करें,और अपने दैनिक कार्य प्रारम्भ करें।

मां दुर्गा से प्रार्थना
दोस्तों अन्त में सिद्धिदात्री मां से हमें यही प्रार्थना करनी चाहिए कि मैं हमेशा ही आपके ध्यान में तल्लीन रहूं।मुझे न मोक्ष की अभिलाषा है,न सम्पूर्ण वैभव की इच्छा है, न मुझे ज्ञान की आकांक्षा है।हे मां मै आपकी सेवा करता रहूं मेरी यही इच्छा है।हे माता ! मैं आपसे विनती करता हूं कि जन्म-जन्मान्तर तक आपके चरणों की सेवा में लिप्त रहूं।हे शिवानी ! आप यदि किंचित मात्र भी मुझ अनाथ पर कृपा कर दो, तो मेरा जनम सफल हो जाए। हे दुर्गे ! दयानिधे ! मैं भूख प्यास के समय भी आपका स्मरण करता रहूं।हे जगदम्बे ! इससे विचित्र और क्या बात हो सकती है कि आप अपनी कृपा से मुझे परिपूर्ण कर दो।अपराधी होते हुए भी हे माता ! मैं आपकी कृपा से वंचित न रह जाऊं,  मेरी यही अभिलाषा है।हे महादेवी ! आप जो उचित समझें वैसा मेरे साथ व्यवहार करें।जय माता सिद्धिदात्रि।


मां सिद्धीदात्री का ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥


मां सिद्धीदात्री का स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥


मां सिद्धिदात्री का कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥

।जय माता दी।।