Tuesday, 20 October 2015

स्नेह का बंधन


।।।स्नेह का बंधन।।।

प्रेम,
एक सहज प्राकृतिक योग,
सहज आधअयात्मिक अनुभूति,जिसका वात्सल्य रुप है-
स्नेह !!

ममता की छांव में स्नेह का-
पवित्र बंधन किसे अपने आंचल में नहीं समेटता!
किंचित ही कोई अभागा
जो रहा हो दूर स्नेह से!


प्रत्येक मन में अनेक भावनात्मक संवेदनाए
निरंतर आती जाती रहती है तरंगों की तरह
किन्तु-
इन सब में सबसे कोमल व स्थिर स्थान है-
स्नेह का।

माता-पिता एवं भाई बहन के स्नेह को,
हम स्वाभाविक स्नेह कहते हैं।
किन्तु व्याप्त है इसकी सिमाएं सर्वत्र।
भाभी से स्नेह को भी हम माता के स्नेह से,
कम नहीं आंकते।

साहित्य के मर्मज्ञों ने तो,
इस स्नेह पर महान ग्रंथों की,
रचनाएं तक कर डाली।
तमाम कवियों ने वात्सल्य रस के,
सुरसरी में कराया हमें स्नेह का संगम!!


गोस्वामी तुलसीदास जी ने सभी शंकाओं का,
खंडन करते हुए मानस माता सीता के,
चरित्र से लक्ष्मण को पुत्रवत स्नेह का,
अद्भूत दर्शन कराया!!

भिन्न भिन्न भांति से पहूंचकर,
जन जन तक-
स्नेह का बंधन
अकल्पनिय सुखानुभूति का बनता माध्यम!
सिर पर ना हो स्नेह का हाथ जब तक
तब तक मानसिक चैन कहां है किसी को!!

मानते हैं शोधकर्ता भी,
ये समस्त प्रभाव है स्नेह का ;
स्नेह ने किया है कायाकल्प-
संसार का!!

स्नेह का बंधन-
जीवन में व्याप्त कटुता वैमनस्यता ;
घृणा,प्रतिरोध ब आक्रोश,
इन सब को समाप्त करने का सबसे सफल कारक!
ये पुरक है लोगों में आपसी सौहार्द का !
मिलता है सुत्र भी इससे युग निर्माण का!!


मची है भागदौड़ दिनरात
खोज में-
अलौकिक सुख के।
फिर भी-
प्रेम के रुपक में स्नेह से बढ़कर
नहीं मिल पाता कुछ भी।
लाख प्रयास करके विपूल भन संपदा,
एकत्र कर ली जाए तो भी-
सब कुछ फिका फिका है...
स्नेह के सामने। 
स्नेह के समक्ष-
किसी ऐश्वर्य की कल्पना,
व्यर्थ है।।


जीवन में स्नेह अविचलीत है-
जिस प्रकार-
अटल है नक्षत्र मण्डल में ध्रुव तारा
संकटों को दूर करने वाला
ये संचारीभाव ही है लोक में कल्याणकारी!!

सभी पिड़ाओं को का हरण करने में समर्थ
ये स्नेह,
निराश व्यक्ति के जीवन में औषधि के समान है।
स्नेह में आशा की अनेक धाराएं फुटती हैं।

स्नेह-
एक ऐसा सुत्र,एसी माला,एक ऐसा धागा,
जिसमें बंधने के पश्चात,
किसी अन्य चीज की आशा या मोह की इच्छा-
खत्म हो जाती है जीवन में।

शायद इसीलिए कहते हैं-
ईश्वरीय प्रेम का अभिनव प्रयोग है-
स्नेह!!!
।।।स्नेह का बंधन।।।
                                                     संदीप कुमार मिश्र