Tuesday, 22 August 2017

BJP का मिशन 350,तो क्या 2019 में विपक्ष मुक्त भारत!

संदीप कुमार मिश्र: मेरा देश बदल रहा है...अच्छे दिन आने वाले हैं...सबका साथ सबका विकास... ये कुछ ऐसे नारे थे जिनकी बदौलत देश ने 2014 में इतिहास बनते देखा।संसद से लेकर सड़क तक केसरिया ही केसरिया नजर आने लगा।उम्मीद और विश्वास की आस में जनता जनार्दन ने कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंका और बीजेपी को सत्ता पर काबिज कर नरेंद्र मोदी को देश का सर्वप्रिय,सर्वमान्य नेता बना दिया।
क्या 2019 में बीजेपी विपक्ष का सफाया कर देगी ?
दरअसल एक तरफ तो प्रचंड़ बहुमत के जोर पर लगातार एक के बाद एक कड़े फैसले लेते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो दूसरी मोदी जी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते, बिना रुके बिना थके चुनाव दर चुनाव लड़ते -लड़वाते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और तीसरी तरफ कोने में सिमटता जा रहा विपक्ष। ऐसे में क्या देश की राजनीति आने वाले कुछ वर्षों के लिए एक ध्रुव पर केंद्रित होने जा रही है।एक तरफ तो 2019 के लिए 350 के अपने लक्ष्य को पाने के लिए पसीना बहाती बीजेपी तो दूसरी तरफ विपक्ष खासकर कांग्रेस का ढीलाढाला रवैया...।
बीजेपी के लिए 350 का लक्ष्य हासिल करना कितना आसान?   
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या बीजेपी 2019 में विपक्ष का सफाया करने जा रही है,क्या बीजेपी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार होने जा रहा है।
दरअसल 18 राज्यों और केंद्र में बीजेपी और उसके गठबंधन की सरकार...लोकसभा में अकेले बीजेपी के 281 सांसद...और एनडीए के कुल 339 सांसद... 2019 की रणभेदी बजने में लगभग 2 साल का वक्त और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का अलग-अगल राज्यों का 95 दिनों का तूफानी दौरा।सवाल ये है कि यदि बीजेपी के चाणक्य अमित शाह 2019 के 350 का लक्ष्य साधने में लगे हैं, तो विपक्ष की परेशानी बढ़ना स्वभाविक है।अब अगर बीजेपी के 350 के लक्ष्य के साथ आप उसके घटक दलों को जोड़ दें तो 350 प्लस कहां जाकर पहुंचेगा कह पाना कठीन है...यानि विपक्ष मुक्त भारत का बीजेपी जुमला साकार!जिसके लिए बीजेपी युद्ध स्तर पर लग गई है...।


क्या सिर्फ मोदी विरोध के एजेंडे से बनेगी विपक्ष की बात ?
यहां तक बीजेपी के नेताओं का कहना भी है कि उनमें और जनता में उत्साह है बीजेपी को लेकर....हम जरुर 2019 में मोदी जी की अगुवाई में 350 का लक्ष्य हासिल करेंगे...वहीं विपक्ष बीजेपी के इस टारगेट पर खुब कुतर्क संगत उपहास भी उड़ा रही है...लेकिन उसकी अपनी रणनीति कहीं नजर नहीं आ रही है...ऐसे में बिहार में जहां विपक्षी खेमें में सेंध लगाकर बीजेपी ने नीतीश कुमार को अपने खेमें में कर लिया तो वहीं शरद यादव अन्य विपक्ष को इकट्ठा कर अपनी अपनी भड़ास निकालते दिख रहे हैं।

कांग्रेस के युवराज ने भी कहा कि बीजेपी से लड़ने के लिए एक होना जरुरी है।जिसपर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सिर्फ बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्ष का एक होना आवश्यक है या फिर उनकी सोच देश को आगे बढ़ाना भी है,जो कि कहीं नजर नहीं आ रही है।क्योंकि बिना किसी ठोस और मजबूत एजेंडे के बीजेपी को 2019 में हरा पाना लगता है कि विपक्ष के लिए दूर की ढ़ोल सुहानी वाली बात साबित होगी।।


बहरहाल एक सवाल तो उठता ही है कि लोकतंत्र की बेहतरी के लिए विपक्ष का रहना नितांत आवश्यक है,लेकिन क्या विपक्ष सही दिशा में आगे बढ़ रहा है,क्योंकि विपक्ष में सर्वमान्य         कोई चेहरा नजर नहीं आता।क्या इसके लिए विपक्ष किसी अखबार में सर्वमान्य नेता के लिए इश्तिहार देगी या फिर हकिकत में आम जनमानस की बात,उनकी परेशानियां,और उनके बीच में जाकर काम करेगी।क्योंकि ये 21वीं सदी की पब्लिक है जो सब जानती है।।।

गणेश चतुर्थी विशेष :सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों? जानें रोचक कथा


संदीप कुमार मिश्र:  हमारे हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है,उसके बाद समस्त देवी-देवताओं की पूजा की जाती है फिर कार्य को प्रारंभ किया जाता है।अब चाहे नए घर की पूजा हो,दुकान में पूजा हो,शादी-विवाह हो या अन्य किसी भी प्रकार के उत्सव या शुभ कार्य...हर प्रकार के कार्य को शुरु करने से पहले लंबोदर भगवान श्री गणेश की आराधना पूजा सबसे पहले की जाती है। तभी तो हम सब श्रीगणेशाय नम: कहकर या लिखकर नए कार्य का श्रीगणेश करते हैं।

गणेश चतुर्शी की शुरुआत 25 अगस्त से और समापन 5 सितंबर2017
प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी गणेशोत्सव की धूम देश भर में रहेगी.जिसकी शुरुआत 25 अगस्त से हो रही है और 5 सितंबर तक चलेगी। गणेश चतुर्थी में भगवान श्रीगणेश जी की पूजा अर्चना बड़े ही भक्ति भाव से की जाती है।

क्यों की जाती है सबसे पहले श्रीगणेश की पूजा
दरअसल सिर्फ गणेश चतुर्थी पर ही नहीं, बल्कि सभी प्रमुख तीज त्योहारों पर पूजा की शुरुआत गणेश जी की आराधना से ही होती है।इसके पीछे सबसे बड़ी मान्यता है कि गणेश जी की पूजा करने से किसी भी शुभ कार्य में किसी भी प्रकार की कोई विघ्न, बाधा नहीं आती है और कार्य सकुशल संपन्न हो जाते हैं।
क्या है भगवान गणेश की पूजा की पौराणिक कथा
एक कथा के अनुसार सभी देवताओं में इस बात को लेकर विवाद होने लगा कि सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए,और कौन है सर्वश्रेष्ठ।सभी देवगण स्वयं को सर्वेश्रेष्ठ बताने लगे। तभी नारद जी वहां पहुंचे और पूरी स्थिति को समझकर सभी देवताओं को आदिदेव महादेव भगवान शिव की शरण में जाने को कहा।जिस संबंध में भगवान शिव ने कहा कि वो जल्द ही इस पूरे मामले को एक प्रतियोगिता के जरिए सर्वश्रेष्ठ का फैसला करेंगे।
योगीराज महादेव भगवान शिव ने प्रतियोगिता आयोजित की।जिसके अनुसार सभी देवों को अपने वाहन पर सवार होकर उन्हें ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर आने को कहा गया।जो भी देवता सबसे पहले चक्कर लगाकर आएगा उसकी जीत होगी और सबसे पहले उसी की पूजा होगी।
अपने वाहन में सवार होकर सभी देव निकल पड़े ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने।जबकि गणेश जी अपने वाहन पर सवार नहीं हुए। वे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने के बजाए अपने माता-पिता यानि की भगवान शिवजी और माता पार्वती के चक्कर लगाने लगे।माता पिता की भगवान श्रीगणेश ने सात बार परिक्रमा करके, हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
ऐसे में जब सभी देवता थक के चूर होकर ब्रह्माण्ड की परिक्रमा लगाकर वापस लौटे तो उन्होंने गणेशजी को वहीं खड़ा हुआ पाया जहां प्रतियोगिता प्रारंभ होने से पहले देखा था।अब बारी थी परिणाम की।जिसमें तनिक भी देर किये बीना भोलेभंडारी भगवान शिवजी ने तुरंत गणेश जी को विजयी घोषित कर दिया। जिसपर जब अन्य देवों ने वजह पूछी तो महादेव ने कहा कि, संपूर्ण ब्रह्माण्ड में माता-पिता को सबसे सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता-पिता की पूजा करना ही सबकुछ है।संसार में उनसे बढ़कर दूसका कोई नहीं।इस पर सभी देवों ने भगवान गणेश की बुद्धि और विवेक की सराहना की और उन्हें देवों में अग्रगण्य का खिताब मिला और गणेशजी की पूजा सबसे पहले की जाने लगी।


।।श्री गणेशाय नम:।।

गणेश चतुर्थी विशेष :भगवान श्रीगणेश को मोदक क्यों प्रिय है, जानें

SANDEEP/SAMBODHAN
संदीप कुमार मिश्र: भाद्रपद मास की चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक यानी पूरे दस दिनों तक देश भर में रहती है गणेश चतुर्थी की धूम।लंबोधन भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए हर भक्त आतुर रहता है।इस बार गणेश चतुर्थी का त्योहार 11 दिनों तक चलेगा।साल 2017 की गणेश चतुर्थी की शुरुआत 25 अगस्त से होगी।
हमारे धर्म शास्त्रों में गजानन भगवान गणेश को ज्ञान,बुद्धि, विवेक, समृद्धि,सौभाग्य और आरोग्य के देवता के रूप में सर्वमान्य रुप से पूजा जाता है।कहते हैं कि किसी भी देव की पूजा बिना प्रसाद चढ़ाए पूरी नहीं होती और सभी देवी-देवताओं का अलग अलग प्रसाद होता है।अब बात भगवान गणपति की करें तो लंबोदर भगवान गणेश जी को मोदक अति प्रिय है।
SANDEEP/SAMBODHAN
क्या आप जानते हैं मोदक क्यों है खास ? 
दरअसल हमारे धर्म शास्त्रों में मोदक को जिस प्रकार से पारिभाषित किया गया है उसका अर्थ है कि- मोद यानी आनन्द देने वाला,कहने का भाव है कि  जिससे आनंद प्राप्त होता है। गहराई से इसके भाव को समझें तो तन के लिए आहार हो या मन मस्तिष्क के विचार हों,उनका सात्विक और शुद्ध होना बेहद जरुरी है, तभी तो मनुष्य जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त कर सकता है।

मोदक को ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसलिए ज्ञान बुद्धि के दाता...देवताओं में अग्रगण्य भगवान श्रीगणेश को मोदक अतिप्रिय हैं।कहते हैं कि जिस प्रकार से मोदक बाह्य रुप से तो कठोर होता है लेकिन अन्दर से नरम और मिठास से भरा होता है,ठीक उसी प्रकार घर परिवार के मुखिया को उपर से सख्त होकर संस्कार और नियमों का परिवार जन से पालन करवाना चाहिए लेकिन अंदर से परिवार के प्रति नरम रहकर सभी का पालन पोषण करना चाहिए...जिससे कि भगवान गणेश की कृपा परिवार और कुटुंब पर बनी रहे और परिवार में सुख संबृद्धि बनी रहे।
धर्म शास्त्रों में मोदक और गणेश जी के संबंध में तो यहां तक कहा गया है कि जो भी भक्त श्रद्धा और प्रेम से भगवान गणेश जी को हजार मोदक का भोग लगाता है,उस भक्त की सभी मनोकामनाएं,इच्छाएं भगवान श्रीगणेश अवश्य पूरी करते हैं।
SANDEEP/SAMBODHAN

।।जय श्री गणेश।।


Monday, 21 August 2017

तिरूपति बालाजी मंदिर,जहां बनते हैं रोज़ 3 लाख अद्भूत लड्डू,जाने क्या विशेषता

sandeep kumar mishra
संदीप कुमार मिश्र : विविधताओं से भरा देश भारत.जहां धर्म और उसके प्रति आस्था को सनातन संस्कृति में जीवन पद्दति बताया गया है।एक ऐसी जीवन पद्धति जहां ईश्वर से साक्षात्कार का सरल और सुगम मार्ग तो बताया ही गया है,साथ ही अज्ञानता और मोह में किए गए पापों को दूर करने के भी रास्ते बताए गए हैं।
दरअसल जब हम मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए जाते हैं,तो हमें प्रसाद दिया जाता है, चरणामृत दिया जाता है।जो हमारी आत्मा को शुद्ध करने के साथ ही हमारी अज्ञानता को भी दूर करता है।हर एक मंदिर में भगवान को भोग लगाने के लिए अनेकों प्रकार के व्यंजन बनाते हैं, प्रसाद भी अनेकों प्रकार के बनाए जाते हैं।जिनकी अपनी एक अलग खासियत और विशेषता होती है।
तिरुपति बालाजी मंदिर, जहां बनते हैं रोजाना 3 लाख लड्डू
हमारे देश में एक ऐसा मंदिर है जहां प्रतिदिन 3 लाख लड्डू प्रसाद बनाए जाते हैं,जो विशेष सुरक्षा जांच को बाद तैयार होते हैं।लड्डू भी ऐसा जिसका स्वाद सबसे अलग।आपको बता दें कि तिरुपति बालाजी मंदिर में पिछले 300 सालों से भी ज्यादा समय से तिरूपति के मंदिरों में एक खास लड्डू चढ़ाया जाता है।जिसकी विशेष मान्यता है।
sandeep kumar mishra
बाकायदा टिकट के साथ भक्तों को मिलता है लड्डू
अक्सर तिरुपति बालाजी मंदिर में आपको श्रद्धालूओं की भीड़ मिल जाएगी।लेकिन आप जल्दी दर्शन करना चाहते हैं तो आपके लिए खास सुविधा भी उपलब्ध है यहां।आप मंदिर में दर्शन के लिए 300 रुपये वाला टिकट खरीद सकते हैं,जिससे आपके दर्शन भी जल्दी हो जाएंगे और साथ ही आपको 2 लड्डू मुफ्त में दिए जाएंगे। वहीं जो श्रद्धालू लाइन में लगे रहते हैं वो अपनी  इच्छानुसार इस विशेष लड्डू को खरीद सकते हैं।
sandeep kumar mishra
10 से 25 रुपये तक है लड्डू की कीमत
प्रसाद के रूप में मिलने वाले लड्डू की सबसे बड़ी खासियत है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता है।जिस वजह से इसे ज्यादा दिनों तक खाया जा सकता है। इसकी कीमत की बात करें तो 10 रूपये से लेकर 25 रूपये के लड्डू आप खरीद सकते हैं।शायद ही कोई भक्त ऐसा होगा जो अपने प्रसाद में इस खास लड्डू को शामिल ना करें।यहां आने वाले लोग इस खास लड्डू को जरुर खरीदते हैं।
sandeep kumar mishra
खास रसोई में बनते हैं खास लड्डू
तिरुपति बालाजी में भगवान को चढ़ने वाले ये लड्डू एकदम ताजा होते हैं।यही वजह है कि प्रतिदिन मंदिर के रसोई घर में तकरीबन तीन लाख लड्डू तैयार किये जाते हैं।जिस खास रसोई में इस लड्डू को तैयार किया जाता है उस ख़ुफ़िया रसोई को 'पोटू' कहते हैं।जहां पर केवल मंदिर के पुजारी और कुछ खास लोग ही आ जा सकते हैं। इस रसोई की सबसे खास बात यह है कि यहां साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखा जाता है।
sandeep kumar mishra
लड्डू की होती है बेहद कड़ी सुरक्षा
तिरुपति बालाजी मंदिर में मिलने वाले इस खास लड्डू को प्रसाद के तौर पर पाने के लिए श्रद्धालूओं को एक कड़े सुरक्षा दायरे से होकर गुजरना पड़ता है। जिसमें सुरक्षा कोड और बायोमेट्रिक विवरण जैसे, चेहरे को पहचानना वगैरह मौजूद होते हैं।
sandeep kumar mishra
आखिर कैसे तैयार होते हैं ये लड्डू ?
बालाजी मंदिर में तैयार होने वाले खास लड्डू की रेसिपी भी सबसे अलग होती है।इस खास लड्डू को बनाने में बेसन, किशमिश, मक्खन, काजू और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है।तैयार लड्डू का वजन 174 ग्राम का होता है।एक और खास बात जो इस लड्डू की है वो ये कि लोग इस लड्डू को घर पर भी बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन स्वाद ऐसा नहीं हो पाता है।यकिनन बालाजी मंदिर का ये विशेष प्रसाद लड्डू अद्भूत है।
sandeep kumar mishra
तिरुपति बालाजी मंदिर की कमाई करोड़ों में
तिरुपति बालाजी मंदिर की कुल संपत्ति तकरीबन 1.30 लाख करोड़ रूपये है।मंदिर में कुल 60,000 करोड़ का सोना, चांदी और अन्य रत्न हैं।साथ ही 8500 करोड़ रुपये की एफडी के साथ ही इन्वेस्टमेंट भी की गई है।सालाना कमाई की बात करें तो 600 करोड़ रुपए से ज्यादा मंदिर की कमाई है।मंदिर में आने वाले चढ़ावे को अनेकों प्रकार के धर्मार्थ कार्य में लगाया जाता है।
sandeep kumar mishra
सनातन संस्कृति,धर्म-संस्कार,योग, स्वाध्याय के साथ ही समसामयिक जानकारी के लिए जरुर पढ़ें संबोधन...और अपने विचार जरुर कमेंट बाक्स में लिखें।आपकी प्रतिक्रिया ही मेरे लिए उपहार और सम्मान है।धर्मो रक्षति रक्षित:।।


Thursday, 17 August 2017

सड़क पर नमाज सही तो थाने में जन्माष्टमी और कांवड़ पर डीजे क्यों नहीं ?- योगीराज

संदीप कुमार मिश्र: सड़क पर नमाज भी अदा होगी और डमरू भी बजेगा, माइक भी लगेगा और बगड़ बम बम का जयकारा भी लगेगा।मंदिर में जन्माष्टमी भी मनेगी जनाब।कन्हैया का जन्मोत्सव भी खूब धूमधाम से मनेगा....।कांहे लगेगी रोक....बताइए!
दरअसल उत्तर प्रदेश के थानों में जन्माष्टमी उत्सव को लेकर ये बात कही सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने ।योगी जी का कहना था कि अगर वो सड़कों पर ईद के दिन नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगा सकते, तो थानों में जन्माष्टमी का उत्सव कैसे रोक सकते हैं।अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने कांवड़ यात्रा का जिक्र करते हुए भी कहा कि कांवड़ यात्रा में बाजे नहीं बजेंगे, डमरू नहीं बजेगा, माइक नहीं बजेगा, तो कांवड़ यात्रा कैसे होगी ? यह कांवड़ यात्रा है, कोई शव यात्रा नहीं, जो बाजे नहीं बजेंगे।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए योगी जी ने कहा कि उन्होनें अधिकारियों से सभी धार्मिक स्थलों पर माइक बैन करने का आदेश पारित करने को कहा था।जिसे लागू करना संभव नहीं था,इसपर उनका कहना था कि ऐसे में कांवड़ यात्रा में भी माइक पर बैन कैसे लगाया जा सकता है।ये यात्रा तो ऐसे ही चलेगी।बल्कि उन्होनें ये भी कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान हेलिकाप्टर से पुष्प वर्षा भी होनी चाहिए...ना जाने किस भेष में भोले घूम रहे हों...।सही बात है भई...ना जानें किस रुप में महादेव की कृपा बरस जाए।बस ध्यान रहे तो इतना किसी भी शोर में कोई आह,क्रंदन दब ना जाए।
खैर सवाल उठता है कि धार्मिक सद्भावना को बनाए रखने के लिए क्या जरुरी नहीं कि धार्मिक स्वतंत्रता का दूरुपयोग ना हो...और किसी भी प्रकार के अतिउत्साह से बचा जाए।कृष्ण का जन्मोत्सव भी जरुरी है,ईद की नमाज भी और बम बम का जयघोष भी...प्रभातफेरी भी जरुरी है,जिजस को याद करना भी...धर्मनिरपेक्ष देश में सभी को समान स्वतंत्रता का अधिकार है...बशर्ते किसी अन्य को आपके अभिव्यक्ति से कोई हानी ना पहुंचे।

सियासत का आनंद तो तब है जनाब जब सियासत में धर्म का सम्मान हो ना कि धर्म पर हो सियासत।हिन्द का सुंदर स्वरुप तब साकार होगा,जब सबके दिल में प्यार बसे,जिस धरा पर हर कोई सुखी हो।जात-पात का भेद समाप्त हो जाए,भूख और गरीबी से कोई ना परेशान हो।जहां शांति से खुदा की इबादत मस्जिद में हो और मंदिर में भगवान की आरती।तभी तो भाव राग और ताल के साथ भारत का निर्माण हो सकेगा।
हम तो नव भारत के निर्माण की बात करते है,ऐसे में क्या जरुरी नहीं कि नव भारत का स्वरुप उस उपवन की तरह हो जहां पर हर रुप रंग और आकार के पुष्प हों।आईए मिलकर बनाएं एक ऐसा ही उपवन।भारत माता की जय।।



Wednesday, 9 August 2017

‘सावन’ में शिव साधना के बाद ‘भादो’ में श्रीकृष्ण जन्म: मंगल ही मंगल


संदीप कुमार मिश्र: सावन में शिव की भक्ति और भाव के बाद हिन्दू धर्म के माननो वाले भक्तों को आश्विन माह के पहले भाद्रपद का अतिविशेष माह यानी भादो का महीना उत्साह और उमंगों से भरा हुआ है...इस भादो के महीने का जन जन को इंतजार रहता है...देश ही नहीं विदेशों में भी या यूं कहें कि संपूर्ण धरा धाम पर भाद्र पद का महिना खास है।क्योंकि सावन में शंकर और भादो में कृष्ण यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव...कन्हईया के जन्म का महोत्सव जिसे विश्व भर में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

दरअसल 8 अगस्त से 7 सितम्बर 2017 तक भादों का महीना है।उसके बाद आश्विन मास का प्रारंभ हो जाएगा।भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का माह है भादो। भादों के ही महीने के कृष्ण पक्ष में रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग और वृष लग्न में श्रीहरि भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण रुप में आठवां अवतार लिया। श्रीकृष्ण की उपासना को समर्पित भादों का महीना कल्याण करने वाला है।

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं।
देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुं।।

हमारे देश के साथ सनातन धर्म को माननो वाले विश्व में जहां कहीं भी रहते हैं, जन्माष्टमी का पर्व बड़ी ही श्रद्धा भाव और धूमधाम के साथ मनाते हैं।जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और रात 12 बजे तक विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आयोजन,भजन किर्तन का आनंद उठाते हैं,और रात्रि 12 बजे कृष्ण जन्म के बाद गोविंद की पूजा-अर्चना करते हैं फिर प्रसाद वितरण करके भक्त व्रत खोलते हैं। वहीं मंदिरों की छटा तो देखते ही बनती है।इस खास अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में विशेष आयोजन किए जाते हैं।

नीति,प्रीति, समर्पण और भावना प्रधान  हैं श्रीकृष्ण
कृष्ण जन्मभूमि के अलावा द्वारकाधीश, बिहारीजी एवं अन्य सभी मन्दिरों में इसका भव्य आयोजन होता है, जिनमें भारी भीड़ होती है। कृष्णावतार,श्रीहरि भगवान विष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है।गोकुल में यह त्योहार 'गोकुलाष्टमी' के नाम से मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल्यकाल की शरारतें जैसे - माखन व दही चुराना, चरवाहों व ग्वालिनियों से उनकी नोंकझोंक, तरह-तरह के खेल, इन्द्र के विरोधकर गोवर्धन पर्वत को अपनी अँगुली पर उठा लेना, जिससे कि गोकुलवासी अति वर्षा से बच सकें, विषैले कालिया नाग से युद्ध व उसके हज़ार फनों पर नृत्य, के साथ ही कन्हैया की मनभावन,लुभा लेने वाली बांसुरी का कर्णप्रिय स्वर, कंस द्वारा भेजे गए गुप्तचरों का विनाश...ये सभी प्रसंग नीति,प्रेम समर्पण और भावना प्रधान वाले हैं।


भगवान श्रीकृष्ण युगों-युगों से हमारी आस्था का केंद्र है, और निरंतर हमें हमारे कर्तव्य का बोध करवाने के साथ ही प्रेम और एकता का संदेश देते हैं।कन्हैया कभी यशोदा मैया के लाल होते हैं तो कभी ब्रज के नटखट कान्हा और कभी गोपियों का चैन चुराते छलिया।वहीं कभी विदुर की पत्नी का आतिथ्य स्वीकार करते हुए सामने आते हैं, तो कभी अर्जुन को 'गीता' का ज्ञान देते हुए। लीलाधारी कृष्ण कन्हैया के अनेक रूप और हर रुप संपूर्ण। 

9 अगस्त : अगस्त क्रांति की 75वीं सालगिरह

sandeep kumar mishra
संदीप कुमांर मिश्र: देश आज अगस्त क्रांति की 75वीं सालगिरह मना रहा हैं...क्रांति की ये अलख देश को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए थी।लेकिन क्या स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा-प्रतीकों,प्रसंगों और विभूतियों का उत्सव मना कर हम आजादी के सही अर्थों को समझ पाए हैं?

अगस्त क्रांति की शुरुआत और मायने
9 अगस्त का दिन भारत की आजादी के लिए इतिहास का पहला गौरवपूर्ण दिन था,जब एक साधारण से दिखने वाले असाधारण से व्यक्ति ने ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला कर रख दी..और अंग्रेजों से कहा कि अब आपके जाने का वक्त आ गया है....अंग्रेजों भारत छोड़ो....अंग्रोंजों को गहरी चोट देने वाले ये शब्द से मोहन से महात्मा बने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के....।इतिहास में वो दिन अगस्त क्रांति को नाम से जाना जाना लगा...जब जन-जन का मन स्वतंत्रता की अंगड़ाई लेने लगा...और गुलामी की बेड़ियों से भारत माता को आजाद कराने आवाज हर तरफ से उठने लगी।
खुली हवा में सांस लेते आज यकिनन बहुत अच्छा लगता है,लेकिन इस आजादी के लिए देश के अनगिनत वीर सपूतों ने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया था। एक समय था जब भारत में रहने वाले हर हिन्दुस्तानी की सांसो पर सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य का कब्जा हुआ करता था आतंक और गुलामी में फंसे छोटे-बड़े तबके को जब यह अहसास हुआ कि चुप बैठने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। तब देश में आजादी के लिए हर तरफ से आवाजें उठने लगी।जिसकी अगुवाई राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने की।बापू ने न केवल देश के हर तबके को समायोजित किया बल्कि सभी को एक साथ संगठित होकर आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
sandeep kumar mishra
4 जुलाई 1942 को राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित किया।जिसका उद्धेश्य था कि अंग्रेजों भारत छोड़ो।इस प्रस्ताव में ये भी कहा गया कि ब्रिटिश हुकूमत अगर अपने देश वापस नहीं जाती है तो उनके खिलाफ पार्टी देश भर में आन्दोलन शुरू करेगी।

लेकिन कांग्रेस के इस प्रस्ताव को ब्रिटिश सरकार ने नज़र अंदाज कर दिया। जिसके बाद बाद कांग्रेस ने अन्य सभी दलों से इस आन्दोलन में साथ देने का आह्वान किया। लेकिन सफलता नहीं मिली और फिर 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया।जिसका भरपूर असर ब्रिटिश शासन पर हुआ।और ब्रिटिश डरने लगे।

मुंबई के एक पार्क में शुरू हुए इस आन्दोलन के खौफ से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिल गई।तभी से 9 अगस्त 1942 का वो दिन अगस्त क्रांती कै नाम से जाना जाने लगा।